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02 September 2015

वक़्त के कत्लखाने में -12

वक़्त के कत्लखाने में
यूं ही बैठा बैठा
यही सोचता रहता हूँ
कि आखिर
जगह जगह पसरे पड़े
कूड़े के अनगिनत ढेरों पर
पलता बढ़ता बचपन
क्या कभी  पाएगा
अपना सही मुकाम ?
या बस
स्याही से रंगे पुते
कागज की
कई परतों में सिमटी
'कल्याणकारी' योजनाओं का
बनकर कोई हिस्सा
खुद को पाएगा वहीं
जहां वह पहले से था
सड़क के किसी किनारे
या ऐसे ही
वक़्त के
किसी और
कत्लखाने में।

~यशवन्त यश©

18 July 2015

वक़्त के कत्लखाने में-11

वक़्त के कत्लखाने में
जल जल कर
स्वाहा होता मन
बस कुछ
ठंडी  बौछारों की
तमन्ना लिए
झुलसता रहता है
सैकड़ों तंज़ के
बोझ को
ढोते हुए
क्योंकि यही
उसकी नियति है
हर पल 
करना अनुभव
स्वर्ग और नर्क को
यहीं इसी जगह
इसी
वक़्त के कत्लखाने में ।

~यशवन्त यश©

11 July 2015

वक़्त के कत्लखाने में -10

मेरे भीतर
ये सांसें
जो चल रही हैं
अभी तक
निर्बाध
अपनी गति से
आखिर थमेंगी ही
एक न एक दिन
अपना समय आने पर
रुकेंगी ही
बिना कुछ कहे
यूं ही मौन
कई अधूरी
इच्छाओं को 
साथ लिए
कहीं उड़ चलेंगी
किसी नये आशियाने में
फिर किसी और
वक्त के कत्लखाने में
गुनहगार बनने
अनकही
अनजानी
अनसुनी
बातों का।

~यशवन्त यश©

11 March 2015

वक्त के कत्लखाने में -9

वक्त के कत्लखाने में
तन्हा बैठे बैठे
खुद की कुछ सुनते
खुद से कुछ कहते
कुछ बातें करते करते
कभी कभी
डूब जाता हूँ
एक सीमा में सिमटे
अँधियारे समुद्र की
उन गहरी लहरों में
जहां से
इच्छा नहीं होती
वापस आने की
फिर भी 
आना होता है
देखने को
बदलाव की तस्वीर
लेकिन हर बार
दीवार पर
टंगे आईने में 
मुझे दिखती है
वही पुरानी कालिख
अपने चेहरे पर
जो
सैकड़ों जन्मों के बाद भी
नहीं बदली
और शायद
कभी नहीं बदलेगी
क्योंकि
यही तो पहचान है
हर उस मुखौटे की
जो सदियों से
बिना सांस लिये
यूं ही बैठा है
वक्त के कत्लखाने में। 

~यशवन्त यश©

01 February 2015

वक़्त के कत्लखाने में -8

बाहर चल रहे
तेज़ तूफान के असर से
वक़्त के कत्लखाने के भीतर
होने लगती है
हलचल 
हिलने लगते हैं पर्दे
दरवाज़े और खिड़कियाँ
अंतिम पल
गिनने लगती हैं
भीतर की रोशनियां  ..
हवा के तीखे झोंके
झकझोर देते हैं
कई पैबंद लगी
खंडहर सी इमारत की नींव
जिसमें रहने वाले
इंसानी शक्लो सूरत वाले
नवजात और
उम्रदराज जीव
कंपकपाने  लगते हैं
अनहोनी की आहट से
और तभी
उम्मीदों के कुछ बादल
कहीं से आ जाते हैं
छा जाते हैं 
और बरस जाते हैं
आँखों से आंसुओं की तरह
दे जाते हैं नमी
प्यास से व्याकुल
हिलती डुलती धरती को
और फिर
हल्की मुस्कुराहट के साथ 
लौट आते हैं
वही पुराने
सुकून के पल
वक़्त के
इसी कत्लखाने में। 
 
~यशवन्त यश©


(इस श्रंखला की पिछली पोस्ट्स यहाँ क्लिक करके
पढ़ सकते हैं।)  

10 October 2014

वक़्त के कत्लखाने में -7

बज रहा है
कभी धीमा
कभी तेज़ संगीत
वक़्त के
इसी कत्लखाने में
जहाँ बंद आँखों से
ज़िंदगी
रोज़ देखती है
अगले सफर के
सुनहरे सपने
और खुश हो लेती है
देह की
अंतिम विदा में
उड़ते फूलों की
लाल पीली 
पंखुड़ियों को
महसूस कर के
खुद पर
बिखरा हुआ ....
आज
नहीं तो कल
जिस्म की कैद से
बाहर निकल
उसे भटकना ही है 
खुद के लिये
फिर एक नये
पिंजरे की खोज में
सुनते हुए
वही चाहा-
अनचाहा संगीत
जो  सदियों से
बजता आ रहा है 
एक ही सुर में
वक़्त के कत्लखाने में।

~यशवन्त यश©

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07 May 2014

वक़्त के कत्लखाने में -6

वक़्त के कत्लखाने में
उखड़ती साँसों को
साथ लिये
जिंदगी 
बार बार देख रही है
पीछे मुड़कर
और कर रही है
खुद से कई सवाल
जिनका जवाब
आसान नहीं
तो मुश्किल भी नहीं है
मगर
आँखों के सामने
हालातों की तस्वीर
उलझी हुई है इस कदर
कि संभव नहीं रहा
पहचानना
और ढूंढ निकालना
सही -सच्ची बातों को
'क्या 'क्यों' और 'कैसे'
अब बनने वाले हैं भूत
भविष्य की
परिभाषा रच कर
उखड़ती साँसों को 
साथ लिये 
जिंदगी 
निकल रही है 
अंतहीन सफर पर। 

~यशवन्त यश©

02 April 2014

वक़्त के कत्लखाने में -5

वक़्त के कत्लखाने में
कैद जिंदगी
कभी कभी देख लेती है
उखड़ती साँसों की
खिड़कियों के
पर्दे हटा कर
बाहर की दुनिया
और हो जाती है हैरान
झोपड़ियों को घूरती
महलों की नज़रें देख कर ....
आज नहीं तो कल
फूस के ये नन्हें मकान
या तो खिसक जाएंगे
दो कदम आगे
या तो बदल लेंगे
खुद का रूप
या सिमट जाएंगे
लॉन की
हरी घास बन कर ....
शायद इसीलिए खुश है
जिंदगी
उखड़ती साँसों के
पर्दे डली
खिड़कियों के भीतर
वक़्त के कत्लखाने में
जिसके अंधेरे तहखाने की
सीढ़ियाँ
चढ़ती-उतरती है
अपनी मर्ज़ी से
बाहर के अंधेरे-उजालों से
बे परवाह हो कर।

~यशवन्त यश©

01 April 2014

वक़्त के कत्लखाने में - 4

टंगा हुआ है
एक आईना
वक़्त के कत्लखाने में
देख कर जिसमें
खुद का अक्स
अक्सर गुनगुनाती है जिंदगी
बीते दौर के नगमे
जो सहेजे हुए हैं
मन की एल्बम के
हर पन्ने पर .....
इन नगमों में
दर्द है
मस्ती है
बहती नदियां
और उनमें
तैरती कश्ती है
जो चलती जा रही है
अपनी मंज़िल की ओर
भँवरों में फंस कर
उबरते हुए
तेज़ लहरों में डगमगा कर
संभलते हुए .....
इन नगमों में
तस्वीरें हैं
उस बीते दौर की
जब खिलखिलाती थी
जिंदगी
हलाल होने को
वक़्त के
इसी कत्लखाने में।

~यशवन्त यश©

26 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -3

वक़्त के कत्लखाने में
सांसें गिनती जिंदगी
कितने ही एहसासों को
खुद के भीतर दबाए
हर पल
मांगती रहती है मन्नतें
इस दुनिया के पार जाने की
लेकिन
तैयार नहीं
देने को
इम्तिहान
तो विकल्प क्या ...?
हाँ विकल्प है
सिर्फ एक ही विकल्प
कि वक़्त के कत्लखाने में
सांसें गिनती जिंदगी 
वक़्त से पहले ही
उम्मीदों की 
सबसे ऊपरी मंज़िल से 
कूदकर नीचे
हो जाए मुक्त
इन तमाम झंझटों से।

~यशवन्त यश©

23 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -2

वक़्त के कत्लखाने में
सिमट कर बैठने की
कोशिश करती रूह
चाह कर भी
नहीं निकल पाती बाहर
बंद पिंजरे से ...
हो नहीं पाती आज़ाद
कई कोशिशों के बाद भी ....
वह मजबूर है
सुनने को
पल पल बिंधती देह की 
आहें....
जो बढ़ती ही जाती हैं
उम्र के ढलान पर ....
उभरती झुर्रियों के
खंजर
झेलने होंगे
आखिर कब तक ?
और
आखिर कब
कामयाब होगी
यूं फैली बैठी हुई रूह
पूरी तरह सिमट कर
अपने वर्तमान को
मिट्टी में मिलाने में .....
वो पल भी आएगा
अपने तय पल पर
मुझे इंतज़ार है
बेसब्री से
जब यह एहसास
लुढ़के पड़े मिलेंगे
किसी रोज़ ....
वक़्त के कत्लखाने में । 

~यशवन्त यश©

20 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में-1

वक़्त के कत्लखाने में
कट कट कर
ज़िंदगी
नयी उम्मीदों की आस में
झेलती है
यादों के चुभते
हरे ज़ख़्मों की टीस....
ज़ख्म -
जिनके भरने का
भान होते ही
उन पर छिड़क दिया जाता है
नयी नयी बातों का
आयोडीन रहित
ताज़ा नमक....
जो कैद रखता है
दर्द को
नसों में भीतर तक
फिर भी निकलने नहीं देता
मूंह से एक भी आह
क्योंकि
वक़्त के कत्लखाने में
कट कट कर
ज़िंदगी
सुन्न ज़ुबान 
और सिले हुए होठों से 
बयां नहीं कर सकती 
अपनी तड़प 
बस
झेलती रहती है 
यादों के चुभते
हरे ज़ख़्मों की टीस
आज़ाद हो कर 
मुक्त आकाश में 
उड़ने की 
तमन्ना लिये। 

~यशवन्त यश©
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