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02 September 2015

वक़्त के कत्लखाने में -12

वक़्त के कत्लखाने में
यूं ही बैठा बैठा
यही सोचता रहता हूँ
कि आखिर
जगह जगह पसरे पड़े
कूड़े के अनगिनत ढेरों पर
पलता बढ़ता बचपन
क्या कभी  पाएगा
अपना सही मुकाम ?
या बस
स्याही से रंगे पुते
कागज की
कई परतों में सिमटी
'कल्याणकारी' योजनाओं का
बनकर कोई हिस्सा
खुद को पाएगा वहीं
जहां वह पहले से था
सड़क के किसी किनारे
या ऐसे ही
वक़्त के
किसी और
कत्लखाने में।

~यशवन्त यश©

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (03-09-2015) को "निठल्ला फेरे माला" (चर्चा अंक-2087) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. सामयिक रचना ... विचारणीय मुद्दे को उठती संवेदना को झझकोरती रचना

    ReplyDelete

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