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23 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -2

वक़्त के कत्लखाने में
सिमट कर बैठने की
कोशिश करती रूह
चाह कर भी
नहीं निकल पाती बाहर
बंद पिंजरे से ...
हो नहीं पाती आज़ाद
कई कोशिशों के बाद भी ....
वह मजबूर है
सुनने को
पल पल बिंधती देह की 
आहें....
जो बढ़ती ही जाती हैं
उम्र के ढलान पर ....
उभरती झुर्रियों के
खंजर
झेलने होंगे
आखिर कब तक ?
और
आखिर कब
कामयाब होगी
यूं फैली बैठी हुई रूह
पूरी तरह सिमट कर
अपने वर्तमान को
मिट्टी में मिलाने में .....
वो पल भी आएगा
अपने तय पल पर
मुझे इंतज़ार है
बेसब्री से
जब यह एहसास
लुढ़के पड़े मिलेंगे
किसी रोज़ ....
वक़्त के कत्लखाने में । 

~यशवन्त यश©

2 comments:

  1. समय आने पे मुक्ति तो सभी को मिलनी है .. समय से पहले किसी को भी नहीं ...
    भावपूर्ण प्रस्तुति ..

    ReplyDelete

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