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25 October 2013

परिवर्तन .....

मेरे घर के सामने है
एक बड़ा
खाली मैदान
जिसने देखा है
पीढ़ियों को
जन्मते गुजरते
जिसकी गोद में
खेले कूदे हैं
छोटे छोटे बच्चे
जो बना है गवाह
सावन के झूलों का
पेड़ों से झरते
गुलमोहर के फूलों का ।

वो मैदान
आज खुदने लगा है
आधार बनने को
ऊंचाई छूती
नयी एक नयी इमारत का
जिसकी ईंट ईंट पर
लगने वाला
नया रंग रोगन भी
भुला न पाएगा  
बीते कल की
अमिट खुशबू को।

~यशवन्त यश©

10 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना

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  2. आप की इस खूबसूरत रचना के लिये ब्लौग प्रसारण की ओर से शुभकामनाएं...
    आप की ये सुंदर रचना आने वाले शनीवार यानी 26/10/2013 को कुछ पंखतियों के साथ ब्लौग प्रसारण पर भी लिंक गयी है... आप का भी इस प्रसारण में स्वागत है...आना मत भूलना...
    सूचनार्थ।

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  3. कुछ ऐसा ही मंजर हमारे यहाँ भी चल रहा है...
    बहुत ही भावपूर्ण रचना...

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  4. खुबसूरत अभिवयक्ति......

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  5. उम्दा प्रस्तुति .... ज़मीं की कमी को इंगित करती .. मेरे ब्लॉग पर आप कल नहीं आ रहे यशवंत भाई

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  6. कड़वी सच्चाई ....
    बदलते दौर में कम पैसे वालो को घर मिलने लगा है
    लेकिन ....

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  7. कड़वे यथार्थ का सुन्दर चित्रण

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  8. कभी नहीं भूलती हैं उन जगहों से जुडी यादें …. भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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