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10 June 2017

सब अच्छा है.....

नहीं कहीं कमी कोई
जो दिख रहा वह अच्छा है
जो कुछ अब तक सुना-सुनाया
सबने कहा वह सच्चा है।

बांध आँख पर काली पट्टी
डूब कर दिन के सपनों में
अच्छा-अच्छा अपने कहते
जो मन कहता वह सच्चा है।

लंबी चादर तान कर सोता
दिन-रात का पता नहीं कुछ
मुझ से आ कर यह मत पूछो
बाहर शोर क्यूँ शोर होता है ।

नहीं कहीं कमी कोई
जो दिख रहा वह अच्छा है
बुरा बराबर जो जो कहता
वह सब अकल का कच्चा है।

-यश ©
10/जून/2017

01 June 2017

वहीं उसी मोड़ पर ......

बीत रहा है
साल दर साल
और मैं वहीं
उसी मोड़ पर
हूँ खड़ा
जहाँ
मेरी तक़दीर
या
कारनामे
छोड़ गए थे
बीती
कई सदियों पहले।
 .
मैं
तब से आज तक
धूप -छाँह
आँधी -तूफान
और
न जाने क्या क्या
झेलता हुआ
सहता हुआ
खुद से
खुद की
कहता हुआ
बस कर रहा हूँ -
तलाश
तो सिर्फ
उस पल की
जिस पल
कोई मुक्तिदूत
आ कर
दिखा दे राह
इस मूर्त जन्म से
किसी नये
पारदर्शी जन्म की।

-यश ©


25 May 2017

टाई वाला मजदूर......


एक्ज़िक्यूटिव क्लास
टाई वाला मजदूर
अपने गले में
आई कार्ड का पट्टा लटकाए
कान में हेडफोन
और 'कॉन कॉल' का
शोर सुनते हुए
'लाइन' पर रह कर
'एक्सक्यूजेज़' देते हुए
भटकता फिरता है
दर बदर
भारी भरकम
और कभी कभी
एवरेस्ट से भी ऊंचे
टारगेट के
चरम
या उसके आस-पास
कहीं पहुँचने को।

वह दिन भर
मौसम के हर रूप
शहर के हर मोड़
और गली को
गूगल के नक्शे पर
नापते हुए
अपनी कुंठा
और खिन्नता को
छुपाते हुए
अपने चेहरे की
कृत्रिम मुस्कुराहट
और ऊर्जा से
कोशिश करता है
ए सी की ठंडक में
लक्ज़री चेयर पर बैठे
अपने 'क्लाइंट' को
लुभाने की
और बदले में
कुछ पाने की।

एक्ज़िक्यूटिव क्लास
टाई वाला मजदूर
'बेलदार' तो नहीं
पर उससे
कम भी नहीं होता
यह बात अलग है
कि वह ईंट और गारा
नहीं ढोता।
वह ढोता है
अपने दिमाग में
बहुमुखी अपेक्षाओं
आशंकाओं की
ईंटों के चट्टे ...
अपने
अनोखे 'लक्ष्यों'
और उन्हें पाने की
जुगाड़ों के
कई नायाब तरीके।

वह
करता रहता है
हर संभव कोशिशें
नौकरी को
'सेफ' रखने की
'इन्सेंटिव' नहीं
तो 'सिर्फ 'सैलरी' से
जीने की
क्योंकि उसके घर में
उसके साथ
कुछ लोग
गुज़र करते हैं
एक छोटी सी रसोई में
बने
दाल-भात
सब्जी और अचार की
थोड़ी सी
खुराक से।

-यश©
25/मई/2017


20 May 2017

दक्षिण की एक फिल्म से क्यों थर्रा गया बॉलीवुड-सुनील मिश्र, फिल्म समीक्षक

हिंदुस्तान-19/मई/2017
तीन सप्ताह से दिलचस्प तमाशा देखने में आ रहा है।  दक्षिण से दो-तीन साल पहले बनकर आई फिल्म बाहुबली  ने जैसे बॉलीवुड की सारी प्रतिभाओं और क्षमताओं पर तुषारापात करके रख दिया था। बॉलीवुड के ही बरसों से खाली बैठे एक निर्माता उसके वितरक बन बैठे और इतना धन अर्जित किया, जितना यदि वह खुद कोई फिल्म बनाते तो भी न अर्जित कर पाते। केवल डिस्ट्रीब्यूशन से उनके चेहरे पर आर्थिक सफलता की वह मुस्कान तिर गई कि उनको बैठे-बिठाए यही लाभ का धंधा नजर आया। जबकि उनकी पहचान एक ऐसे युवा फिल्मकार के रूप में बनी हुई है, जो नए जमाने के समझ-बूझ वाले सिनेमा का जानकार है और उसकी नब्ज भी समझता है। ऐसा निर्माता एक वितरक के रूप में अपनी कमाई पर गर्व कर तो रहा था, लेकिन शायद वह यह समझने को तैयार नहीं था कि यह धंधा ही उसके परंपरागत कारोबार के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। 
बाहुबली का निर्माण और उसके पहले संस्करण की सफलता दरअसल मुंबइया सिनेमा को आईना दिखाने वाली बड़ी घटना थी। भारतीय सिनेमा में, सिनेमा के प्रति प्रतिबद्धता, समर्पण, सिनेमा को एक बड़ा और सबसे ज्यादा सांस्कृतिक रूप से संप्रेषणीय आयाम मानकर तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम में बनने वाली अनूठी व असाधारण फिल्मों की एक परंपरा रही है। आज भी दक्षिण की ही फिल्मों को सबसे ज्यादा श्रेणियों में नेशनल अवॉर्ड मिलता है, तो इसकी वजह ही यह है कि वे सिनेमा को अपनी संस्कृति और परंपरा के विस्तार का अविभाज्य अंग मानते हैं। हिंदी सिनेमा में मुंबइया सिनेमा के साथ-साथ बरसों तक दक्षिण का पारिवारिक व सामाजिक सिनेमा चला है, जिसमें जेमिनी व प्रसाद प्रोडक्शंस जैसे घरानों के योगदान को नहीं भुला सकते।
बॉलीवुड के कलाकार 30 साल से ज्यादा समय से अपनी सुरक्षित और व्यावसायिकता की आदर्श शर्तों से भरी रोजी-रोटी दक्षिण के सिनेमा से प्राप्त करते रहे हैं। बॉलीवुड भले बहुत उदार न रहा हो, लेकिन दक्षिण के सिनेमा में बॉलीवुड के सितारों को बहुत उदारतापूर्वक अपनाया गया है। लगभग इतने ही समय से दक्षिण भाषायी फिल्मों का हिंदी में भी निर्माण होता आ रहा है, पिछले एक दशक में यह और अधिक बढ़ गया है। दक्षिण में सिनेमा के 50 दिन चलने पर निर्माता फिर से उसके हजारों-लाखों पोस्टर लगवाकर जश्न मनाता है और दर्शकों का उपकार मानता है, जब सौ दिन या सिल्वर जुबली होती है, तब तो बात अलग ही होती है। सलमान खान को भी दक्षिण से अच्छी स्क्रिप्ट की तलाश रहती है और अक्षय कुमार को भी दक्षिण से प्रेरित कहानियों ने सितारा बनाने में योगदान किया है।
ऐसे केंद्र से बाहुबली का प्रदर्शित होना सब तरफ चमत्कार की तरह प्रचारित कर दिया गया है। बाहुबली का प्रथम प्रदर्शन व उससे जुड़े कौतुहलपूर्ण प्रश्नों को देखते हुए शोले का समय याद आ गया, जिसके संवाद आज भी भुलाए नहीं जा सके हैं। पहले बाहुबली से उपजे प्रश्न का समाधान हमारे देश को इस बाहुबली में जाकर जितनी आसानी से मिल गया, वह कम हास्यास्पद नहीं है, पर यह भी उल्लेखनीय है कि दक्षिण की फिल्म निर्माण संस्थाएं व लोग सस्पेंस, रहस्य व गोपनीयता को आखिरी समय तक जाहिर नहीं होने देते। उन्हें यदि दर्शकों को अचंभित करना है, तो उसकी पूरी तैयारी होती है।
बाहुबली के दूसरे भाग के लिए पूरे देश के सिनेमाघर पूरी तरह शरणागत होकर रह गए। निर्माता, निर्देशक और सितारों ने अपना ध्यान खेल में लगाया और पलक-पांवड़े बिछाकर बाहुबली भाग-दो का स्वागत किया। सारे सिनेमाघर, सारे शो ऐसे इस फिल्म ने मुट्ठी में कर लिए जैसे दूसरी फिल्मों को देश-निकाला दे दिया गया हो। आत्महीनता और गिरे आत्मविश्वास की बात है कि इस तूफान से भयभीत दूसरे निर्माता पीठ करके खड़े हो गए। हाल यह है कि देश के हर सिनेमाघर, हर शो में सिर्फ बाहुबली। देखो तो बाहुबली, न देखो तो बाहुबली। वास्तव में यह दयनीय स्थिति है सिनेमा के लोकतंत्र के लिए, सिनेमा की संस्कृति के लिए। कहना मुश्किल है कि इसमें कितना बाहुबली का अपना बल था और कितना दूसरों की भुजाओं को काठ मार जाना।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-19/मई/2017

यह तो होना ही था


जीवन के सफर में
कुछ पाना कुछ खोना ही था
हमें पहले ही पता था
कि यह तो होना ही था। 

उनकी फितरत ही ऐसी है
कि क्या कहें -कब कहें
खुद ही नहीं जानते
आँखों पर पट्टी बांधे हुए
वह सच को नहीं मानते। 

मझधार पर बीच भंवर में
फँसकर डूबना ही था
हमें पहले ही पता था
कि यह तो होना ही था।

-यश ©
20/मई/2017  
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